Sunday, February 6, 2011

खेल बचपन के...


बस यादों में बाकी हैं बचे, वो खेल बचपन के,
बच्चे फिर से बन पाते तो फिर से वो मज़ा आता..

गुड्डा तने दूल्हा बना, गुड़िया सजी दूल्हन,
सज बारात में जाने का फिर से वो मज़ा आता..

वो लाली गेंद-ताड़ी की, तो विष-अमृत के वो प्याले,
इक्कल कूद, दुक्क्ल फांद जाने का मज़ा आता..

टिप्पी-टॉप में रंगीन कागज़ जेब में रखना,
पोशंपा की जेलें तोड़ पाने का मज़ा आता..

चिल्ला, हम तो तेरी ऊँच पे रोटियाँ पका रहे,
फिर नीच वाले को चिड़ाने का मज़ा आता..

बिजली भागे, और खुशियां मनाना आइस-पाइस की,
माँ के आँचल मे फिर से छुप पाने का मज़ा आता..

कड़कती धूप में दिन भर वो साइकिल खींचना क्रैची,
क़ाग़ज़-नांव बारिश में बहाने का मज़ा आता..

हड्डी टूट गर जाती तो फिर उसको जुड़ा लेते,
कमसकम पेड़ से गिरने का तो, फिर से मज़ा आता..

अब तो याद भी मिटने लगी हैं अपने खेलों की,
किसी को खेलता भी देख पाते, तो मज़ा आता.. !!

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